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3-7॥४ अलम्वओं

०१ की, है|

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97 हजस्त अबू हर्य

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[[[05:/8/079५8.0।0/0869/|5/6209099776_830॥9_॥0/9/%५ शैतान सबसे ज्यादा खुश तब होता है जब वो किसी को इल्मे दीन हासिल करने से रोकता है एक रोज़ असत्र के बाद शैतान ने अपना तख़्त बिछाया, और शयातीन ने अपनी अपनी कार गुजारी की रिपोर्ट पेश करना शुरू की किसी ने कहा कि मैंने इतनी शराब पिलाई, किसी ने कहा मैंने इतने ज़िना कराए, शैतान ने सब की ने कहा कि मैने एक तालिबे इल्म को पढने से बाज़ रखा, शैतान सनते ही पर से उछल पड़ा और उस को गले से लगा लिया और कहा, "अनू बने काम किया तूने काम किया, दूसरे शयातीन यह कैफियत देख कर जल गए कि उन्होंने इतने बड़े काम किये, उन पर तो शैतान खुश नहीं हुआ और इस मअमूली से काम करने वाले पर इतना खुश हो गया। शैतान बोला तुम्हें नहीं जो कुछ तुमने किया सब इसी का सदक़ा है उन्हें इल्म होता तो वह गुनाह नं करते, लो तुम्हें >्ज्मब वह कौनसी जगह है जहाँ सब से बडा आबिद रहता है मगर वह आलिम नहीं और वहाँ एक आलिम भी रहता हो तो उन्होंने एक मक़ाम का नाम लिया सुबह को सूरज निकलने से पहले शयातीन को लिए हुए शैतान उस मकाम पर पहुँचा, शयातीन छुपे रहे और यह इन्सान की शक्ल बनकर रास्त में खड़ा हो गया, आबिद साहिब की नमाज़ तहज्जुद के बद फर्ज़ के वास्ते मस्जिद की तरफ तशरीफ लाए रास्ते में शैतान खड़ा था अलैकुम, गम सलाम के बद कहा हज़रत मुझे एक मसला पूछना है साहिब ने ०५42-३० के लिए मस्जिद में जाना है, शैतान ने जेब से एक छोटी सी री और पूछा, क्या अल्लाह क़ादिर है कि उन सारे आसमानों और जमीनों को इस छोटी सी शीशी में दाखिल करदे, आबिद साहिब ने सोचा और कहा कहाँ इतने बडे आसमान और जमीन और कहाँ यह छोटी सी शीशी बोला बस यही पूछना था तश्रीफ़ ले जाईए और शयातीन से कहा, देखो मैंने इस की राह मार उसको अल्लाह की कुदरत पर ही ईमान नहीं इबादत किस काम की, फिर सूरज निकलने के क़रीब एक आलिम जल्दी जल्दी करते हुए तशरीफ़ लाए शैतान ने कहा अस्सलामु अलैकुम मुझे एक मसला है ना है आलिम ने फ़रमाया, पूछो जल्द पूछो नमाज़ का वक़्त कम है, उसने शीशी दिखाकर वही सवाल किया, आलिम साहिब ने फ़रमाया मलऊन तू शैतान अं होता है अरे वह क़ादिर है कि यह शीशी तो बहुत बड़ी है एक सुई के नाके के अंदर अगर चाहे तो करोड़ों आसमान ज़मीन दाखिल करदे, "इन्नल्लाह अला कुल्लि शै इन क़दीर आलिम साहिब के तशरीफ़ ले जाने के बद शैतान ने शयातीन से कहा देखा यह इल्म ही की बरकत है और वह जिसने इल्म हासिल करने वाले को पढ़ने से रोका उसने बहुत बड़ा काम किया ताकि वह पढ़े और आलिम बन सके। ( मलफूजाते आला हज़रत जि:3, स:2-22)

सबक: अब तो शैतान को खुश करने वाला बनो दीन कि किताबो को पढो शैतान से इल्म के जरिये ईमान बचने के लिए दीन का इल्म बहुत बड़ी जरूरी और मुफीद चीज़ है, शैतान ऐसे इल्म वालो से बहुत डरता है क्‍यों कि इल्म वाले अपने इल्म की वजह से शैतान के जाल में नहीं फंसता, बिगैर इल्म के जुहद इबादत भी ख़तरे में रहती है, खूद हुजूर सल्‍लल्लाहु अलैहि वसलल्‍्लम ने फ़रमाया है "फ़क्ीहुन वाहिदुन अशह अल-शैतानि मिन-अल्फि आबिदिन" यअनी शैतान पर एक आलिम हज़ार आबिद से भी ज़्यादा भारी है।"

हक 56766 ५शशंगरी एद्वा]5टवया6/ [05://.86/50७7॥_॥|॥0| 0५ खा

[25 //3।0[]/6 .0।0/6685/08[8993#776_3५॥9_॥72/ध५ हि ्य सूचक मु छा

[बि्‌स्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम

कं हद 56766 ५शशंगरा एद्वा]5टवया6/ [[05:/.86/5 07 _।॥0 08५ कम

८6) जुमला हुकूकु बहक्क ना 80॥8 महफ्‌ज हे (6)

नाम किताब : करामाते सहाबा रजिअल्लाहो अन्हुम

लेखक : हजरत अल्लामा अब्दुल मुस्तफा आज़मी नाशिर : मकतबा इमामे आज़म दिल्ली-6

बऐहतेमाम : मोहम्मद जलालुद्दीन निज़ामी कृम्पोजिगं : निजामी ग्राफिक्स दिल्‍ली-6 पफुफ्रीडिंग : मनन्‍्जुरुलहकु जलाल निज़ामी सेटिंग : तिजामुद्दीन निजामी.

सन्‍ने इशाअत्‌ू ४: 20॥4

तादाद : 700 सफुहात : 256 कोमत्‌ :

मक्तबा इमामे आजम्‌ रजवी किताब घर

425,7-मटिया महल,जामा मस्जिद दिल्‍ली-6 | 423, मटिया महल, जामा मस्जिद दिल्ली-6 मोबाईल नं0- 0995842355], 09560054375 फोन 0.23264524 मोबाईल 9350505879 &ना।ह। : ॥रवदव/ग्यागवार42ाा(हिवागवां।.0ण॥, प20009॥गंटववा(62५779॥.00॥7

कं हद 56766 ५शशंगरी एद्वा]56व्या6/ [[05://.86/5 07 _।॥0 08५

[[[05:/8/079५8.0।0/0869/|5/6208099776_830॥9_॥0/9/%५

करामाते सहाबा ४९ यु मकक्‍तवा इमामे आज़म

नमन एफ शा यर७२१ा “77 चनससस्स्सिन आधा िभ33तस3>स ििननन-ननभनणनननननननशझझशध७भ्भदशतनशभशभशशशशशनननन-नननननननननननननननननधधिभनननन।एए7”“पि7“ए7:्॒#झ्7ि "73 शनि ननननीन नस.

+०-न्‍मससमनम-+-

जनक च्लाबक...॥

पननि७न जन

क्रामाते सहाबा फेहरिस्त मजामीन

| 0 |शर्फ इन्तिसाब तमहीदी तजल्लियाँ तहकीके करामात

मोअजेज़ा और करामत मोअजेजा जरुरी करामत जरुरी नहीं करामत की किसमें मुर्दों को जिन्दा करना.

मुर्दो से कलाम करना

दुनिया के निज्ञाम पर कब्जा बहुत ज़्यादा खाना खा लेना हराम गिज़ाओं से महफूज़ रहना दूर की चीज़ों को देख लेना हेबत दबदबा मुख्तलिफ सूरतों में ज़ाहिर हो जाना दुश्मनों की मक्कारियों से बचना जमीन क॑ ख॒ज़ानों को देख लेना परिशानियों का आसान हो जाना जनालवा चीज़ों का असर करना

24 25

दरियाओं पर कब्जा अफ्जलुलऔलिया

करामाते सहाबा हज़रत अबू बकर सिददीक्‌ .: करामत खाने में बड़ी बरकत माँ के पेट में क्‍या है?

निगाहे करामत 35 |कलमए तस्यिवा से किला चूर चूर खून में पेशाब करने वाला 36 |सलाम से दरवाज़ा खुल गया आगे की बात जान लेना

मदफन के बारे में गैबी आवाज

जमीन का सिमट जाना पौधों से बात चीत शिफा-ए-अमराज जानवरों का फरमांबरदार हो जाना जमाने का कम हो जाना जमाने का लम्बा हो जाना

20 2]

खामोशी कलाम पर कुदरत

खाए पीए बगेर जिन्दा रहना

कं हद 56766 ५शशंगरा एद्वा]5टवया6/ [05://.776/5 07॥॥#/_।॥0 0/9/५ |

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करामाते सहाबा ४४ है मकतवा इमामे आज़म दुश्मन खिन्‍्जीर बंदर बन गए | | 72 कौन कहाँ मरगा कहाँ दफन होगा?

44 |शेखेन का दुश्मन क॒त्ता बन गया | हजरत उमर फारुक | 45 [(कराः !) कब्र वालों से गुफ्तग मदीना की आवाज नेहावन्द तक दरिया के नाम ख़त

49 |चादर देखकर आग बुझ गई

49 ।|मार से जलज़ला खत्म दूर से पुकार का जवाब | 53 कब्र में बदन सलामत 53 |जों कह दिया वह हो गया 54 |लोगों को तकदीर में क्‍या है? दुआ की मक्बलियत 58 |हज़रत उस्माने ग़नी :“ (करामत) ज़िनाकार आँखे

0

कम गुस्ताररी को सज़ा ख्वाब में पानी पी कर सैराब अपने मदफन की ख़बर

64 जरुरी इंतेबाह

शहादत के बाद गैबी आवाज मदफन में फरिश्तों की भीड़ गुस्ताख़ दरिंदा मुह में

06

पक

हजरत अली मुर्तजा ८४ (करामत) कब्र वालों से सवाल जवाब

फालिज जदा अच्छा

हो गया गिरती हुई दीवार थम गई आपका झूठा कहने वाला अंधा हो गया

| 65

फारिशतों चक्‍का चल में कब बवफात पाउगा ?

73 | 74 [दर ख़बर का वजन

टा हुआ हाथ जोड़ दिया... 75 |शैहर औरत का बेटा निकला. | 76 जरा सी देर में करआन मजीद ग्त्म कर लेते ६गाए दरिया को तुग्यानी ख़त्म 77 जासूस अंधा हा गया 7 |तुमहारी मौत किस तरह होगी? 77 पत्थर उठाया तो पानी का... |. चश्मा निकल पड़ा 79 [हज़रत तलहा बिन उबैदुल्लह (करामत) एक कब्र से दूसरी | (८6८ मी, हजरत जुबैर बिन अव्वाम 5.5 (करामत) ब-करामत बरछी _85 |फतेह फस्तातू_ 86 [हज़रत जुबैर की शक्ल में जिब्राईल अलैहिस्सलाम हज़रत अब्दरहमान बिन औफ .::

हज़रत उसमान को ख़िलाफत जन्नत में जाने वाला पहला

मालदार इंसान

माँ के पेट ही से नेक हज़रत सअद बिन अबी वकास :£' (करामत) बदनसीब बूढ़ा दुश्मने सहाबा का अंजाम गुस्ताख़ की ज़बान कट गई चेहरा पीठ की तरफ हो गया

5८664 ५शशंगर ए752८वाा6श

[[05://.776/50॥॥_|॥0[/0/9५

करामाते सहावा #4[25:॥#/0५6.009/06/ 4 &27999॥8 4५ | शिय््तवा इमामे आजम | («८ #]

'िमन्‍न्‍मननन»»»नक-मनमनाा नरम तय ऑन तर कर कक टन यमन < ««++++-++--थभ ८८ नन-ा-ाननननमनन८3७७७५७५७५७७33७+ऊ५+भ+++«++७++++७+भ७3७33 ८८ ८८-ानमनम--ा----नमनन-ाननननन नमन ७७७५ +५७++++०++-+०++-++-०+७»+-+०»+००-७७०७७०००७७५++»+++»+०५»+«»+ा के» _क कक कक नमक, बा... पन++ममम नमन...

| फरिश्तों से खेमा भर गया ]]8 |हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर बिन हजाम |]20 | (करामात) फरिश्तों ने साया किया कपफ़न सलामत बदन तरोताजा | ([2] कब्र में तिलावत

22 हजरत मअज़ बिन जबल

अनननक ०5 जा के ७9:3+-नमा।. पाहाकाः

[]22।(करामात) मह & ] नकलता था | था गा

ाााक25 उन» » कक नम कक» कक कक कक कक का तन लललन्निन नशभननम-+--«-++ -नन3+++++-+न-+++++--ल्‍. नी + -पन>«>«ऋ> 99

अर -.:.: ..... मरा साहह»-»-+-

(करामात) कब्र मुबारक शिफा ख़ाना बन गई हजरत अब्दुल्लाह बिन बसर 83 | (करामात) रिज़्क में कभी तंगी नहीं हुई | 32 | हज़रत अमर बिन हमक्‌ ४४ 32 | (करामात) अस्सी बरस को उम्र में सब बाल काले 33

हजरत अब्दुल्लाह बिन उमर:<- (करामात) शेर दुम हिलाता हुआ भागा... ण्क से मुलाकात ज़्याद कैसे हलाकु हुआ? |6 [हज़रत सअद बिन मआज 8 [| (करामात)जनाज़ा में ७० हजार

फरिश्ते

मिट॒टी मुश्क्‌ू बन गई

4

हजरत आसिम बिन साबित £ (करामात) शहद की मवखियों का पहरा

5८664 शशंग ए75०वाा6श

[[05://.776/50॥॥_|॥0/0/9५

[[[05:/8/079५8.0।0/0869/|5/6209४099776_30७॥9_॥0/9/%५ मकक्‍तवा इमामे आजम

वि कक 33355 + पक कससससससससतसस सत्ज्जज्ज्ज्ज्क्ण क्र ननिओआआआआआआआंछछछऊऋऋचड वन भा

करामाते सहाबा 6९

(करामात) मुस्तजाबुददआवात (दुआ) | |27 | (करामात) हाथ हर मर्ज को दवा 200 [हजरत सायब बिन अक्रअ्‌ :5 | [2॥8 | हज़रत उसामा बिन जैद 200 [करामात) तस्वीर ने खज़ाना बताया | |28 |बंअदबी करने वाले काफिर हो गए | | 20] [हजरत इरबाज़ बिन सारिया ४: | |29 | हजरत नाबगा ८४ (करामात) फरिश्ते से. 29 | (करामात) सौ बरस तक दाँत मुलाकात और गुफ़्तगू (बात) _ सलामत

हज़रत ख़ुब्बाब बिन आरत:-- हज़रत उमर बिन तुफैल दोसी .-

(करामात) खुश्क थनदूध से भरगया (करामात) नरानी कोड़ा _ |220 |हजुरत अग्र बिन मुर्रा जुहनी : 227

203 | हजरत मिक्‌दाद बिन असवद _ कंदी (६ (करामात) दुश्मन बलाओं में

204 | (करामात) चूहे ने 7 अशर्फियाँ गिरफ्तार नजर को हजरत ज़ैद बिन ख्वाजा अंसारी ८: (करामात) मौत के बाद गुफ्तगू (बात) हज़रत राफिअ्‌ बिन खदीज::: | 224 | (करामात) बरसों हल्क्‌ (गले) हि में तीर चुभा रहा

224 [हज़रत मोहम्मद बिन साबित

हज़रत उरवा बिन अबी जुअद | बारकी :5६ (करामात) मिट॒टी भी खरीदते | तो नफ्‌्अ्‌ उठाते हज़रत अबू तलहा अंसारी: (करामात) लाश ख़राब नहीं हुई हजरत अब्दुल्लाह बिन हजश.:: (करामात) अनोखी शहादत _ हज़रत बराअ्‌ बिन मालिक: 2] | (करामात) फतेह शहादत

एक साथ

206

206

(करामात) चेहरा आईना बन गया | हज़रत मआविया बिन मक्रनः:

226 | (करामात)दो हज़ार फरिरते नमाजे जनाज़ा में हजरत एहबानबिनसैफीगिफारी (करामात) कब्र सं कफन वापस हजरत नजला बिन मोआविया अंसारी ४४ (करामात) हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के सहाबी हजरत उमैर बिन सअद अंसारी:

हजरत अबू हुरैरा

हज़रत उबाद बिन बशर : 22 करामत वाला ख़्वाब हज़रत उसैद बिन अयास अदवी (करामात) चेहरे से घर रौशन | |

हजरत बशरबिन मआविया बकाई£

.. ्लमककक--मऋअा

5८664 शशंग ए75०वाा6श

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करामाते सहाबा, 0) मकतवा इमामे आज़म

लिन न्‍कााा----- 23 ना -+नननन-न--ननवाबध वा ०० नननााणणण।।।ण।णणण/“7 7? डिि७२?लननब,नान- नमन -मनतपाकलााननन-ाण 7777-77 7777-77“ “7 सललााननाााद- नल ०33 कक न+--+-+3-+------+ का -च -++- 37-77 7777० 0... . ड़ >9अ अअअबकसज कक न्‍्ल्च््ै््ी लि ड:,:, अअ अजअड ससनसक्‍ चतनततततन क्‍त क्तफतयओ& खनन सईअ _ :_ छसऑऑक्‍क कक कक्क्‍्चइ 5 क्ए._यआ् न्ााा॥४।ा।यननन््ा खत खत नाना ता... आनताना अ्नचचक् लड:स?ज सडसजअअइअबउ:ऊ & अस्‍अऊ ह£४ ऑफ सससससस तन तन

(करामात) ज़ाहिदाना जिंदगी हजरत उम्मे शरीक्‌ दोसिया:& | हज़रत अबू क्रसाफा (करामात) गैबी डोल 237 [(करामात) सैंकड़ों मील दूर | |253 [खाली कूृप्पा घी से भर गया

आवाज पहँँचती थी हजरत उम्मे साएब.:: हज़रत हस्सान बिन साबित | 253 [(करामात) दुआ से मुर्दा ज़िंदा

239 | (करामात) हज़रत जिब्राईल हो गया मसददगार हजरत जनीरा 772

करामत वाली कुव्वते शामा (करामात) अंधी आखें रोशन

हजरत जैद बिन हारिसा .-: हो गई

(करामात) सातवें आसमान स+ कलर फरिश्ता ज़मीन पर हि

242 [हज़रत उकबा बिन नाफअ्‌ फहरी के

(करामात) एक पुकार से दर्रिंद फरार घोड़े की टाप से चश्मा जारी | हज़रत अबू जैद अंसारी :: (करामात) सौ बरस का जवान हजरत औफ बिन मालिक :: 245 | (करामात) पुकार पर मवेशी है दौड़ पड़े हज़रत फातिमातुज़्जहरा «- (करामात) बर्कत वाली सेनी 248 |शाही दावत

250 |उम्मुल मोमिनीन हजरत क्‍ आईशा सिद्दयौका 5: (करामात) हज़रत जिब्राईल उनको सलाम करते थे उनके लिहाफ में वही उतरी आप के वसीले से बारिश हजरत उम्मे अमन ४५४ (करामात) कभी प्यास नहीं लगी

| 250

नि ड़ हि 56766 ५शशंगरा एद्वा]5टवया6/ [[05://.क्‍76/5 07॥॥#/_।॥0 0/9/५ |

[[[05:/8/079५8.0।0/0869/|5/620909776_30७॥9_॥0/9/%

शफू इत्तिसाब्‌

हजराते सहाबाए किराम रजियल्लाहु अन्हुम के दरबारे फजीलत में एक नियाज मन्द मुसलमान का

मुहनन्‍्नत का नलराना

मेरे आका के जितने भी असहाब हैं उस मुबारक जमाअत पे लाखों सलाम

व्राकपाएं सहाबा:-

अब्दुल मुस्तफा आज़गी अफ़ी जन

करीमुद्दीनपुर, पोस्ट घोसी, जिला आजुमगढ़

नि कं हद 56766 ५शशंगरा एद्वा]5टवया6/ [05://.क्‍06/5 07॥॥#/_।॥0 0/9/५ |

[[05:/9/079५8.0॥0/0895/(008/088706_30॥9_॥0/3/%५

कराजाते सहाबा &# |] मक्तवा इमामे आज़म बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीर

मन्कुृबते सहाबा किराम्‌ £८ दो आलम क्‍यों हो निसारे सहाबा कि है अर्श मन्जिल वकारे सहाबा अमीं हैं यह कुरआन दीने खुदा के मदारे हुदा एऐतबारे सहाबा रिसालत की मंजिल में हर हर कदम पर नबी को रहा इंतेजारे सहाबा खिलाफत, इमामत, विलायत, करामत हर एक फजुल पर इक्तेदारे सहाबा नुमायाँ है इस्लाम के गुलसितां में हर एक गुल पे रंगे बहारे सहाबा कमाले सहाबा, नबी की तमनन्‍ना जमाले नबी है करारे सहाबा यह मोहरें हैं फरमाने ख़ात्मुर्रुसुल की है दीने खुदा शाहकारे सहाबा सहाबा हैं ताजे रिसालत के लएकर रस ले खा दा ताजदारे सहाबा उन्हीं में हैं सिद्दीक फारुक उसमाँ उन्हीं मे अली शहसवारे सहाबा उन्हीं में है बद्र उहदद के मुजाहिद लकब जिनका है जॉनिसारे सहाबा उन्हीं में हैं अस्हाब शिजरा नुमायाँ जिन्हें कहते हैं राजदारे सहाबा उन्हीं में हुसैन हसन, फातिमा हैं नबी के जो हैं गुल अजारे सहाबा पसे मर्ग आजमी यह दुआ है बन्‌ में ग॒बारे मजारे सहाबा अप पद

है (25 4 हि ] 8/5 है| | |_|7 | ) 0 ] | | |) 8 [५ 5८664 ५शशंगरा ए75०वाा6श

[25://079५86.070/069॥8/(00[0ध08॥76 8५॥४ _॥0 करामाते सहाबा 0 हे मकतवा इमामे आजम

बिस्मिल्लाहिर्हमानिरहीम

तमहीदी तजल्लियाँ[ ६)५॥9॥ ,5॥5(::5।5| | 6४५७ (० ... ७.८. बुजु्गने दीन की करामतों का नूरानी ब्यान यूँ तो हर दौर में हमेशा होता रहा और इन उनवान पर तकरीबन हर जबान में किताबें भी ना जाता रहा मगर इस जमाने में इस का चर्चा बहुत ज़्यादा बढ़ गया ह। चुनान्च तजरबा है कि अक्सर तकरीर करने वाले अपनी तकरीरों की महफिलों में और बेशतर पिराने केबार अपने मुरीदीन की मजलिसों में बुजुर्गेने दीन के करामात के जिक्र म“महफिलों को गर्म किया करते हैं और सुनने वाले एक खास जज़्ड्रेटक साथ सुनते रहते हैं आर कुछ मुसन्‍नफान और मज़मून लिखने वाले भी इस उनवान पर अपना कलम कारियां जोहर दिखा कर लोगों से खेराजे तहसीन हासिल करते रहते है और इस म॑ ज़रा भी शक नहीं कि बुजुर्गाने दीन की करामता का ब्यान एक एसा असरदार और दिल कश मज़मून है कि इस रूह का नापाको, दिल में नूरे ईमान और दिल दिमाग के गोशा गोशा में इमाना तजाल्लया का सामान प॑दा हो जाता हे जिस से अहले ईमान की इस्लामी रगों में एक तूफानी लहर और बदन की बोटी बोछ में जोशे आमाल का एक इरफानी जज़्वा उभरता महसूस होता है, इस लिए मेरा नज़रिया यह है कि इस जमाने में बुजुर्गने दीन की इबादतों, रियाजतों और उन को करामतों का ज़्यादा से ज़्यादा जिक्र व्यान और उन का चर्चा मुसलमाना म॑ जाश ईमान और जजबाए अमल पैदा करने का बहत ही असरदार जरिया ओर निहायत ही बेहतरीन तरीका है लंकिन करामात जिक्र के सिलसिले में मेरे नजदीक एक वाकिआ बहुत ही हैरत नाक बल्कि इन्तेहाई तकलीफ देने वाला है कि मुतअख़्ख़रान ओलियाए कराम खास कर मजजूबों और बाबाओं के

करफ करामात और ख़ास कर दारे हाजिर के पीरों की करामतों का ््क््च्कतसिसतत खफऊर्:/!/ ै॑/।/0/|/॥/॥/॥॥"""््््््.ऱ़़़ग

5८664 शशंग ए75०वाा6श

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[[[05:/8/079५8.0।0/0869/|5/6209809776_30७॥9_॥0/9/%५

करामाते सहावा 52 !3 मकतवा इमामे आज़म

तो इस क॒दर चर्चा है कि हर गली बाज़ार बल्कि हर मकान दुकान, होटलों ओर चाएख़ाानों में, किताबों और रिसालों के पन्नों में हर जगह इस का डका बज रहा है और हर तरफ इस की धूम मची हुई है मगर अफसोस कि उम्मते मुस्लेमा का वह औलिया का गरोह जो यकोनन तमाम उम्मत में “'अफूजलुल औलिया'' है यअनी “सहाब-ए-किराम लडन की विलायत करामत का कहीं भी कोई तज़्किरा ओर चर्चा कोई सुनाता है कहीं सुनने में आता है, किताबों और रिसालों के पन्‍नों में मिलता है, हालांकि उन बुजुर्गों की विलायत करामत का दर्जा इस कृदर बलन्द बाला है कि अगर तमाम ९: के अगले पिछले औलिया को उन के नक्शे कृदम चूम लेने को खुश किस्मती नसीब हो जाए तो उन की विलायत करामत ओर बलन्द हो जाए। क्योंकि हकीकत में यही हजरात तो विलायत करामती हैं कि उन के नक्शे कदम पैरवी के बेगैर विलायत करामत तो दूर किसी को ईमान भी नसीब नहीं हो सकता। यह लोग बिला वास्ता आफताबे रिसालत से विलायत का नूर हासिल करके आसमाने विलायत में सितारों की तरह चमकते और करामत बाग में गुलाब के फूलों की तरह महकते हैं और तमाम दुनिया क॑ औलिया उन की विलायत के शाही महलों की पर भिकारी बन कर विलायत के नर की भीक मांगते रहते हैं।

अल्लाहो अकबर! यह वह बड़ी और मुकदस हस्तियाँ हैं जो हुजूरे अनवर*४9#जलाल जमाले नुबुवत को अपनी ईमानी नजरों से देख कर और हबीबे खुदा#ं##क शफे सुहबत से सरफराज होकर तमाम औलियाए उम्मत में इसी तरह नज़र रहे हैं जिस तरह टिमटमाते हुए चिरागों को महफिल में हज़ारों पावर का जगमगाता हुआ बिजली का बल्ब या सितारों की बारात में चमकता हुआ चाँद।

अफसोस कि तो हमारे मुकर्ररीने किराम ने अपनी तकरीरों में सहाबा-ए-किराम को करामतों को बयान किया हमारे बुज्गों ने अपने मुरीदों को इस से तर किया हमारे उलमाए अहले

कर हक 5 56766 ५शशंगरा एद्वा]5टवया6/ [[05:/॥.776/50॥॥_॥।॥॥0/09/4/9५ कम

॥[05:॥/8/079५8.0/5/0७68/5/6)08098/06_9५॥8 _॥0/8/9 करामाते सहावा /£2 4 मकतवा इमामे आजम सुन्‍्नत ने इन उनवान पर कभी कुलम उठाने की जहमत गवारा की, हालाँकि राफजियों के मुकाबला में ज़्यादा से ज़्यादा इन उनवान पर लिखने और इस का तज्किरा और चर्चा करने की जरूरत थी और आज भी है क्‍योंकि हमारी ग़फूलतों का यह नतीजा हुआ कि हमारे अवाम जानते ही नहीं कि सहाब-ए-किराम भी औलिया हैं और उन बुजुर्गों से भी करामतों का जुहूर हुआ है। हकीकत में एक मुद्दत से मेरा यह तअस्सुर मेरे दिल का कांटा बना हुआ था। चुनान्चे यही वह जज़्बा है कि जिस से मुतअस्सिर हो कर म॑ अपनी कम हिम्मती और कम इल्मी के बावजूद फिलहाल एक सा (400) सहाबा-ए-किराम के मुकृदस हालात और उन के कमालात हे करामात का एक मजमूआ गुल्दस्ता की सुरत में नाज़रीने किराम क्री खिदमत में नज़र | करने की सआदत हासिल कर रहा हूँ जो 'करामाते सहाबा'' के सीधे सादे नाम से मौसूम है। ७; ५.3 ,< < 5 $)---सच पूछिए तो दर हकौक॒ृत मेरी नज़र में यह किताब इस काबिल ही नहीं थी कि इस को मंज़रे आम पर लाऊँ। क्‍योंकि इतने अहम उनवान पर इतनी छोटी सी किताब हरगिज़ अज़मते सहाबा के शान के लायक नहीं है। मगर फिर यह सोच कर कि हजराते सहाबा किराम£2के दरबारे अज़मत में फूल सही तो कम से कम फूल की एक पंखड़ी हो नज़र करने की सआदत हासिल कर लूँ। इस किताब को छापने को हिम्मत कर ली है। फिर यह भी ख्याल आया कि शायद मुझे कम इल्म की इस कोशिश को देख कर दूसरे अहले इल्म मैदाने तसनीफ्‌ में अपनी कुलम कारी के जौहर देखाएं तो (८ ॥5 42५५४ -:»)(नेक काम की रहनुमाई करने वाला उस काम के करने वाले की तरह है) की नेक बख्ती मुझे नसीब हो जाएगी। में ने इस किताब में हज़राते ख़ुलफाए राशेदीन हजराते अशरए मुबरशरह रिज़्वानुल्लाह अलैहिम के सिवा दूसरे सहाबए किराम के नामों और तज़्करों में जान बूझ कर किसी खास तरतीब का ख्याल नहों किया है। बल्कि दौराने मुताला जिन जिन सहाबा-ए- किराम की

कं हद 56766 ५शशंगरा एद्वा]5टवया6/ [[05://.86/5 7 _।॥॥00/8५ कम

हिल [[[05:/8/079५8.0।0/0869/|5/6209099776_830७॥9_॥0/9/%५ करामाते सहावा 2 5 मकतवा इमामे आज़म

करामतों पर नज़र पड़ती रही उन को नोट करता रहा। यहाँ तक कि मेरी नोट बुक बढ़ते बढ़ते एक किताब बन गई। क्योंकि मेरा असल मकसद तो सहाबा-ए-किराम की करामतों का तज्किरा था। चाहे छोटे सहाबा का जिक्र पहले हो या बड़े सहाबा का। इस से असल मकसद में कुछ फूक्‌ नहीं पड़ता।

तद॒वीन किताब लिखने के बारे में अजीजे मुहतरम मौलाना कुद्रतुल्लाह साहब दारूल उलूम फंजुरसूल बराओं शरीफ का शुक्र गुज़ार होकर उन के लिए दुआ करता हूँ कि उन्होंने किताब के कुछ हिस्सों के मसव्वदों को देखकर सही करके मेरे कुलम के बोझ को कुछ हलका कर दिया। इसी तरह अपने दूसरे मुझख्िलिस शागिरदे खास कर असअदुल उलमा मौलाना अलहाज म॒फ़्ती सैय्यद अहमद शाह बुखारी मुबल्लिगे अफ्रीका साकिन वझ्ुहान जिला कछ और मौलाना सैय्यद मुहम्मद यूसुफ शाह ख़॒तीब जामा मस्जिद चौक भुज जिला कछ और मौलाना अब्दुरहमान साहब मुदर्रिस मदरसा अहले सुन्नत कोठार जिला कछ का भी बहुत शुक्र गुज़ार हँ कि उन मुख्लिस अज़ीज़ों ने हमेशा मेरी किताबों को कद्र की निगाहों से देखा और मेरी किताबों के छपवाने में काफी हिस्सा लिया। /$>॥ (०० ,/५5 ।॥ »»।5->७आखिर में दुआ करता हूँ कि ख़ुदा वन्दे करीम अपने हबीब अलेहिस्सलातु वत्तस्लीम के सदक में मेरी इस हकौर इल्मी कुलमी ख्विदमत को अपने फजल करम से शर्फे कुबूलियत अता फ्रमाए ओर इस को मेरे लिए और मेरे वालिदैन असातजा शागिर्द अहबाब सब के लिए सामाने आखि्रत जरिए मग्फ्रित बनाए।..।..)०॥॥ ५५५ ०-२२ ७-३ (3३० >3।2 02० 6०८7५ 53३/५०)| ५:-०-००५ (| ५०५ (२०

तालिबे दुआ अब्दुल मुस्तफा अअजमी रहमुल्लाह अलह.. शैख़ल हदीस दारूल उलूम अहले सुनन्‍्नत फुजुर्रसूल बराओं शरीफ जिला बस्ती 25 शव्वाल 4398 हिजरी

ब्न्नकून ब्ण्जी

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[[[05:/8/079५8.0।0/05869/|5/6209099776_30७॥9_॥20/9/%५

करामाते सहाबा /£2 (6 मकतबा इमामे आजम

तहकीकु करामात

जमान-ए-नुबूबत से आज तक कभी भी इस मसला में अहले हक के बीच इख्तिलाफ नहीं हुआ कि औलिया-ए -किराम की करामतें हक्‌ हैं और हर जमाने में अल्लाह वालों की करामतों का सुदूर जहूर होता रहा और इन्शाअल्लाह कुयामत तक कभी भी इस का सिलसिला बन्द नहीं होगा। बल्कि हमेशा औलिया-ए-किराम से करामात सादिर जाहिर होती ही रहेंगी।

और इस मसला के सुबुत में करआन मजीद की मुकृद्दस आयतें और अहादीसे करीमा और सहाबा ताबईन का इतना बड़ा ख़ज् किताबों में महफूज़ है कि अगर इन सब बिखरी मोतियों को एक लड़ी में पिरो दिया जाए तो एक ऐसा कीमती हार बन सकता है जो तअलीम तअल्लुम बाज़ार में निहायत ही अनमोल होगा और अगर इन बेखरे पन्नों को किताब में जमा कर दिया जाए तो एक भारी भरकम और बड़ा दफ्तर तैयार हो सकता है।

करामत क्‍या है; मोमिन परहेजगार से अगर कोई ऐसा अजीब गरीब तअज्जुब खुज़ चीज़ सादिर जाहिर हो जाए जो आम तौर पर नहीं हुआ करती तो उस को “'करामत'' कहते हैं इसी किस्म की चीजें अगर अंबिया से ऐलाने नुब॒व्वत करने से पहले जाहिर हों तो '“टरहास'' और ऐलाने नुबुव्वत के बाद हों तो '“'मुअजेजह'' कहलाती हैं और अगर आम मोमिनीन से इस किस्म की चीजों का जहूर हो तो उस को “'मऊनत'' कहते हैं और किसी काफिर से कभी इस की ख्वाहिश के मुताबिक्‌ु इस किस्म की चीज़ जाहिर हो जाए तो इस को '*इस्तद्राज'' कहा जाता है।

मुअजेजह और करामतः ऊपर ज़िक्र की हुई तफसील से मालूम हो गया कि मुअजेजह और करामत दोनों की हकीौकृत एक ही है। बस दोनों में फर्क सिर्फ इस कृदर है कि खिलाफे आदत तअज्जुब ख़ज चीज़ें अगर किसी नबी की तरफ से जाहिर हों तो यह “'मुअजेजह

नस >> ?्?्््आ् ्नहोौोाओओनतफ कच ंंत्च् नि उीीाआशीीरीा चलन िाध्ाननननतभ>भभऑऑभतररननन-नन+-3८--. -_-ननमसत+»-»०»णण-. -न्‍यआा

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करामाते सहावा 2 [7 मकक्‍तबा इमामे आजम

कहा जाएगा। चुनानचा हजरत इमाम याफई अलैहिरहमा ने अपनी किताब नश्रूल महासिनिल गालिया''में तहरीर फरमाया कि इमामुल हरमन अबू बकर बाकलानी अबू बकर बिन फौरक और हुज्जतुल इस्लाम इमाम ग़जाली इमाम फखठ़ारूचद्योन राजी नासिरूद्दोन बैजावी मुहम्मद बिन अब्दुल मलिक सलमी नासिरूचद्यीन तौसी हाफिजुद्दीन सफ़ी अबुल कासिम कुदैरी इन तमाम बड़े उलमाए अहले सुन्नत मुहक्क॒कौने मिल्लत ने एक साथ यही तहरीर फ्रमाया कि मुअजेज़ह और करामत में यही फर्क है कि आदत के खिलाक्‌ का सदूर जहूर किसी नबी की तरफ से हो तो उस को “'मुअजेजह'' कहा जाएगा और अगर किसी वली की तरफ से हो तो उस को '“करामत'' के नाम से याद किया जाएगा। हज़रत इमाम याफुई ने इन दस इमामों के नाम और उन की किताबों को इबारतें नकल फ्रमाने के बाद यह इरशाद फरमाया कि इन इमामों के इलावा दूसरे बुजुर्गाने मिललत ने भी यही फरमाया है लेकिन इल्म फजल और तहकीक बारीकी के उन पहाड़ों के नाम जिक्र कर देने के बाद और मुहक्केकीन (२९५९०७/८॥४ 50८॥0075) के नामों के जिक्र की कोई ज़रूरत नहीं। (हज्जतुल्लाह अलल आलमीन जिल्द 2, स॒ 849)

मुअजेजुह जुरूरी करामत जरूरी नहीं: मुअजेजह और करामत में एक फर्क यह भी है कि वली के लिए करामत का होना जरूरी नहीं है मगर हर नबी के लिए मुअजेजह का होना जरूरी है क्‍योंकि वली के लिए यह जरूरी नहीं है कि वह अपनी विलायत का ऐलान करे या अपनी विलायत का सुबूत दे। बल्कि वली के लिए तो यह भी ज़रूरी नहीं है कि वह ख़ुद भी जाने कि मैं वली हूँ चुनान्चे यही वजह है कि बहुत से औलिया अल्लाह ऐसे भी हुए कि उन को अपने बारे में यह मालूम ही नहीं हुआ कि वह वली हैं। बल्कि दूसरे औलिया-ए- किराम ने अपने कश्फ करामत से उन की विलायत को जाना पहचाना और उन के वली होने का चर्चा किया। मगर नबी के लिए

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[05:/.06/5 077 _|॥ता|फावा५

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करामाते सहाबा #&7 ]8 मकक्‍तवा इमामे आजम

अपनी नुबुव्वत को साबित करना ज़रूरी है और चूँकि इन्सानों के सामने नुबुव्वत का सुबुत बेगैर मुअजेजह दिखाए हो नहीं सकता इस लिए नबी के लिए मुअजेजह का होना जरूरी और लाज़मी है।

करामत हरी किसमें: औलिया-ए-किराम से सादिर जाहिर होने वाली करामातें कितने तरह की हैं और उन की तादाद कितनी है? इस बारे में अल्लामा ताजुद्दोन सुबकी अलहिरहमा ने अपनी किताब ““तबकात'' में तहरीर फरमाया है फि मेरे ड़याल में औलिया- ए-किराम से जितनी किस्मों की करामतें सादिर हुई हैं उन किस्मों की तादाद (00) एक सौ से भी जायद है। इस के बाद अल्लामा मोसूफ ने कुछ तफसील साथ करामत की (25) पचीस किस्मों का बयान फ्रमाया जिन को हम नाज़रीन की ख्विदमत में कुछ तफसील के साथ पेश करते हें।

() मुदों को जिन्दा करना: यह वह करामत है कि बहुत से ओऔलिया-ए-किराम से इस का जुहूर हो चुका है। चुनानचे सही रिवायतों से साबित है कि अबू उबैद बसरी जो अपने दौर के बड़े अलिया में से हैं एक मर्तबा जिहाद में तशरीफ ले गए जब उन्होंने वतन को तरफ वापसी का इरादा फ्रमाया तो अचानक उन का घोड़ा मर गया। मगर उन की दुआ से अचानक उन का मरा हुआ घोड़ा ज़िन्दा हो कर खड़ा हो गया और वह उस पर सवार होकर अपने वतन ''बसर'' पहुच गए ओर नौकर को हुक्म दिया कि उस की जीन और लगाम उतार ले। खादिम ने जूँ ही जीन और लगाम को घोड़े से अलग किया फौरन ही घोड़ा मर कर गिर पड़ा।

इसी तरह हजरत शेखर मुफरज जो इलाका मिस्र में ''सईद''के रहने वाले थे उनके दस्तरख्वान पर एक परिन्दा का बच्चा भुना हुआ रखा था। तो आप ने फ्रमाया कि “अल्लाह तआला" के हुक्म से उड़ कर चला जा। उन अलफाज़ का उन को जबान से निकलना था कि एक

लमहा में वह परिन्दा का बच्चा जिन्दा हो गया और उड़ कर चला गया। इसी तरह हज़रत शैख्ध अहदल 5% ने अपनी मरी हुई बिल्ली को

]60 ५शं। ए5ट5गशाहशः

[05://.क्‍6/50॥7_|॥ता|फावा५

[[[05:/8/079५8.0।0/0869/|5/6209809776_830॥9_॥0/9/%५

करामाते सहाबा /६९ 9 मकतवा इमामे आज़म पुकारा तो वह दौड़ती हुई शैख के सामने हाजिर हो गई।

इसी तहर हजरत गौसे अअजम अब्दुल कादिर जीलानी 5&“ने टस्तरख़्वान पर पकी हुई मुर्गी को खा कर उस की हड़ौ्ियों को जमा करके फरमाया और यह इरशाद फरमाया कि मुर्गी) तू उस अल्लाह तआला के हुक्म से जिन्दा हो कर खड़ी हो जा जो सड़ी गली हड्डियों को जिन्दा फ्रमाणगा। ज़बाने मुबारक से इन अलफाज़ के निकलते ही मुर्गी जिन्दा हो कर चलने फिरने लगी।

इसी तरह हज़रत शेख जैनुद्दीन शाफुई मुदर्रिस मदरसा शामिया ने उस बच्चे को जो मदरसे के छत से गिर कर मर गया था जिन्दा कर दिया। (हुज्जतुल्लाह जिल्द 2, स856 )

इसी तरह आम तौर पर यह मशहूर है कि बग़दाद शरीफ में चार बुजुर्ग ऐसे हुए जो माँ के पेट से ही वली पैदा हुए। अंधों और कोढ़ियों को ख़ुदा तआला के हुक्म से शिफा देते थे और अपनी दुआओं से मुर्दों को जिन्दा कर देते थे। शैद्ध अबू सअद केलवी शेख बका बिन बतू शैख़ अली बिन अबी नसर हेती शैख अब्दुल कादिर जीलानी। (बहजतुल असरार शरीफ)

(2) मुर्दों से कलाम करना: करामत की यह किस्म भी हज़रत शैख् अबू सईद ख़राज़ और हज़रत गौसे अअजम रहमुल्लाह वगैरह बहुत से औलिया-ए-किराम से बारहा और बहुत ज्यादा ब्यान किया गया है।

(हुज्जतुल्लाह जिल्‍्द 2, 856)

गैख अली बिन अबी नसर हेती का बयान है कि में शैख् अब्दुल कादिर जीलानी £# के साथ हजरत मअरूफ करखी $&क मजारे मुबारक पर गया और सलाम किया तो कृत्रे अनवर से आवाज़ आईं कि «॥५)॥ (|७| ५... | 6 0५० ४५/०५ (बहजतुल असरार)

ग़ैख अली बिन अबी नसर हैती और बका बिन बतू यह दोनों बुजुर्ग हजरत गोौसे आजम शैख अब्दुल कादिर जीलानी #£के साथ हजरत इमाम अहमद बिन हंबल अलैहिरहमा के मज़ार पर हाज़िर हुए तो अचानक हजरत इमाम अहमद बिन हंबल अलैहिर्रहमा कृतब्र शरीफ

606 ५शशां॥ ए75टवाग6

[05:/.06/5 077 _|॥ता|फावा५

[[[05:/8/079५8.0।0/0869/|5/62/09809776_30॥9_॥0/9/%५

करामाते सहाबा ४४2 20 मकतवा इमामे आजम

.....................- ०००० बककककक््न - 3५333 “--. कक न-----७७७७99५५कक का सन ष५ आश्रित |ःाशःाझ ंआ़ नच्श््ल्चल आआआआओआआआआओओओ७ओओंंंषषधकषकक:&::::शह स2325ज,॥ध#नतहतैत़् मा कक नमुनमुननुनुननननुनुननुन॒॒॒॒ आना"; «कल मलुललूभु

से बाहर निकल आए और फरमाया कि अब्दुल कादिर जीलानी। में इल्मे शरीअत तरीकृत और इल्म काल हाल म॑ तुम्हारा मुहताज हूँ। (बहजतुल असरार)

(3) दरियाओं पर कब्जा: दरिया का फट जाना, दरिया का सूख जाना, दरिया पर चलना बहुत से औलिया-ए-किराम से उन करामतों का जुहर हुआ। खास कर सय्यदुल उलमा हज़रत तकौयुद्योन बिन दकौकूल ईद#&क लिए तो इन करामतों का बार बार जुहूर आम तोर पर लोगों में मशहूर है। (हुज्जतुल्लाह जिल्द 2, स॒ 856)

(4) हकीकत का बदल जाना: किसी चीज को हकोक॒त का अचानक बदल जाना यह करामत भी कई बार औलिया-ए-किराम से हुआ है। चुनान्चे शैख़ ईसा हितार यमनी 5& के पास बतोर मज़ाक के किसी गुस्ताख ने शराब से भरी हुई दो मशकें तोहफा में भेज दीं। आप ने दोनों मश्कों का मुँह खोल कर एक दूसरे में शराब को उडेल दिया। फिर वहाँ पर मौजूद लोगों से फ्रमाया कि आप लोग इस को खायें। हाज़िरीन ने खाया तो इतना अच्छा और इस कदर बेहतरीन घी था कि ताउम्र लोगों ने भी इतना उमदा घी नहीं खाया।

(हुज्जतुल्लाह जिल्द 2 856)

(5) जमीन का सिमट जाना: सेकड़ों हज़ारों मील की दुरी का कुछ लमहों में तैय होना यह करामत भी इस कदर ज्यादा अल्लाह वालों से हुई है कि इस की रिवायत हद्चे तवातुर (किसी बात को इतने लोग ब्यान करें की उतने लोगों का एक ही बात पर झूठ बोलना ना मुम्किन हो)तक पहुँची हुई हें। चुनान्वे तरतूस की जामा मस्जिद में एक वली तशरीफ फरमा थे। अचानक उन्होंने अपना सर गिरेबान में डाला और फिर चन्द लमहों में गिरेबान से सर निकाला तो वह एक दम कअबा में पहुँच गए। (हुज्जतुल्लाह जिल्द 2, स॒ 856)

(6) पेड़ पौधों से बात चीत:ः बहुत से जानवर,पेड़ पौधे और कककड़ पत्थरों ने औलिया-ए-किराम से बात की। जिन की कहानियाँ बहुत किताबों में हैं। चुनान्चे हज़रत इब्राहीम अद्हम अलैहिर्रहमा बैतुल

कं हद 56व7606 ५शशंगा एद्वा75टवयगा6/ [[05://.क्‍06/5 07॥#/_।॥0 0/9/५ |

॥05:॥/8/079५8.0/5/0668/5/6)0808/76_9५॥8 _॥0/8/9 करामाते सहावा &४2 2] मकतवा इमामे आज़म मुकदस के रास्ते में एक छोटे से अनार के पेड़ के साया में उतर पड़े तो उस पेड़ ने बआवाज़े बुलन्द कहा कि अबू इस्हाकु आप मुझे यह शफ अता. फरमाइए कि मेरा एक फल खा लीजिए। इस पेड़ का फल खट्‌्टा था मगर दरख़्त की तमन्ना पूरी करने के लिए आप ने इस का एक फल तोड़ कर खाया तो वह बहुत ही मीठा हो गया। और आप की बरकत से साल में दो बार फल देने लगा और वह पेड़ इस कदर मशहूर हो गया कि लोग इस को रूमानतुल आबेदीन (नेकों का अनार) कहने लगे। (हुज्जतुल्लाह जिल्द 2, 856)

(7) शिफाए अमराज: ओऔलिया-ए-किराम के लिए इस करामत का सुबूत भी बकस्रत किताबों में लिखा है। चुनान्वे हज़रत सिर्री सकृती अलैहिरहमा का ब्यान है कि एक पहाड़ पर मैंने एक ऐसे बुजुर्ग से मुलाकात की जो अपाहिजों, अंधों और दूसरे किस्म किस्म के मरीज़ों को ख़ुदा के हुक्म से शिफायाब फरमाते थे।

(हज्जतुल्लाह जि 2, 857)

(8) जानवरों का फरमाँबरदार हो जाना: बहुत से बुजुर्गों ने अपनी करामत से खतरनाक दरिन्दों को अपना फ्रमॉबरदार बना लिया था। चुनानचे हज़रत अबू सईद बिन अबुल खैर सीनी अलैहिर्रहमा ने शेरों को अपना फरमाँ बरदार बना रखा था। और दूसरे बहुत से औलिया शेरों पर सवारी फ्रमाते थे जिन की हिकायात मरहूर हैं।

(हज्जतुल्लाह जि 2, 857)

(9) जमाना का कम हो जाना: यह करामात बहुत से बुजुर्गों से मन्कूल है कि उन की बारगाह में लोगों को ऐसा महसूस हुआ कि पूरा दिन इस कदर जल्दी गुज़र गया कि गोया घंटा दो घंटा का वक़्त गुज़रा है।

(हज्जतुल्लाह जि 2,स 857)

(40) जमाना का लम्बा हो जाना: इस करामत का जुहूर सेकड़ों उलमा मशाइख से इस तरह हुआ कि उन बुजुर्गों ने कम से कम बक्तों में इस क॒दर ज़्यादा काम कर लिया कि दुनिया वाले इतना काम महीनों बल्कि सालों में भी नहीं कर सकते। चुनान्चे इमाम शाफुई

कं हद 56व77606 ५शशंगरा एद्वा75टवया6/ [[05://.86/5 07 _।॥0 08५ ाआ

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करामाते राहावा ॥7 3 मकतवा डमागे